“बच्चों के लिए शिक्षा एक अधिकार है, लेकिन माता-पिता के लिए अब यह एक संघर्ष बन चुका है …. आर्थिक, मानसिक और सामाजिक”
1. हर महीने की शुरुआत एक डर से होती है
बैंक की कसमसाती हुई स्टेटमेंट, खाली होती जेब, और उस पर मोबाइल पर आने वाला एक मैसेज… “कृपया ₹13,450 की मासिक फीस तुरंत जमा करें…”
कोई माता-पिता इस संदेश को देखकर राहत महसूस नहीं करता। बच्चे की मुस्कान आँखों के सामने तैरती है, और दिल में एक कसक उठती है… “क्या हम इस बार मैनेज कर पाएंगे?”
आज शिक्षा घर के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुकी है।
2. नर्सरी की फीस सुनकर दादी को हार्ट अटैक आया!
ये मज़ाक नहीं, हकीकत है। जब एक माँ ने अपने बेटे का दाख़िला एक निजी स्कूल में कराया, तो फीस ₹1,27,000 सुनकर घर के बुजुर्ग सन्न रह गए।
नर्सरी में दाख़िला यानी लाखों का खर्च, ₹25,000 यूनिफॉर्म व किताबें, ₹50,000 दाख़िला शुल्क और मासिक फीस ₹10,000 से ऊपर!
क्या शिक्षा केवल अमीरों की मिल्कियत बनकर रह गई है?
3. स्कूल अब केवल ‘कलेक्शन सेंटर’ हैं?
हम शिक्षा को तपस्या समझते हैं। लेकिन आज यह एक सेवा नहीं, उत्पाद बन चुकी है।
स्कूल अब बच्चों को नहीं, अभिभावकों की जेबों को टारगेट करते हैं।
आप अपने बच्चे की योग्यता लेकर जाते हैं, लेकिन स्कूल पहले पूछता है …. “आप क्या करते हैं? आपके पास कौन सी गाड़ी है?” क्या यह शिक्षा है या किसी क्लब में एंट्री की प्रक्रिया?
4. कोविड के दौरान स्कूल बंद, फीस चालू
कोरोना के समय पूरा देश ठहर गया था। स्कूल के दरवाज़े बंद थे, मगर फीस के दरवाज़े चौपट खुले थे।
ऑनलाइन क्लास में 30 मिनट की Google Meet, और उसके लिए ₹10,000 की फीस?
न बिजली, न सफाई, न रख-रखाव, फिर भी पूरे साल की फीस क्यों?
कुछ अभिभावकों ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, और उन्हें राहत भी मिली। लेकिन लाखों अब भी चुपचाप बैठे हुए हैं हमारी संस्था प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पैरेंट्स अवेयरनेस (टीम पापा) की तरफ से हाईकोर्ट मे जीत जाने के बाद भी बहुत से पैरेंट्स आज भी अपनी फीस रिफ़ंड नहीं सके हैं कुछ ज्यादा पैसे वाले हैं उन्हे चिंता नहीं है और कुछ स्कूल वालो के आगे खड़े होकर अपने ही पैसे नहीं मांग पा रहे हैं।
5. क्रेडिट कार्ड वाले पेरेंट्स की नई जमात
अब माता-पिता सैलरी से पहले EMI का हिसाब बनाते हैं…. फीस पहले भरनी है, वरना बच्चा स्कूल से निकाल दिया जाएगा।
क्रेडिट कार्ड से पेमेंट, कर्ज़, दोस्त से उधार, गहने गिरवी…. सब कुछ अब सिर्फ इसलिए ताकि “बच्चा पीछे न रह जाए।”
क्या एक देश जहाँ शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है, वहाँ पढ़ाई इतना भारी बोझ होनी चाहिए?
6. कानून हैं, लेकिन स्कूलों को छूट है?
शिक्षा के लिए बने RTE कानून, ‘फीस नियमन’ अधिनियम, शुल्क समिति…. सब किताबों में अच्छे लगते हैं।
लेकिन स्कूलों की फीस रसीद में कोई नियम नहीं दिखता। वे ‘डेवलपमेंट फीस’ के नाम पर लाखों लेते हैं, मगर विकास कहाँ हुआ?
कई स्कूल तो हर साल नई किताबें, नई ड्रेस लागू करवा देते हैं…. ताकि अभिभावक पुराना कुछ भी इस्तेमाल न कर सकें।
7. बच्चों पर भी दबाव …. फीस के साथ मानसिक शोषण
जब माँ-बाप फीस भरने में देरी करते हैं, तो कुछ स्कूल बच्चों को क्लास से निकाल देते हैं, रसीद दिखाने तक बिठाते नहीं।
ये शर्मसार करने वाली बातें बच्चे की आत्मा पर ज़ख़्म छोड़ती हैं।
एक 6 साल के बच्चे को अगर ‘Due Fees’ कहकर बुलाया जाए, तो वह शिक्षा से क्या प्रेम करेगा?
8. अब बस बहुत हुआ …. मिलकर उठानी होगी आवाज़
सवाल ये नहीं कि हम फीस भर पा रहे हैं या नहीं। सवाल ये है कि क्या हम अन्याय को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे?
हर मोहल्ले, हर गली से आवाज़ उठनी चाहिए।
“Progressive association of Parents Awareness (Team Papa) ” जैसी संस्था अब चुप नहीं हैं …. वे बता रही हैं कि “आप अकेले नहीं हैं।”
अब समय है कि माँ-बाप एक मंच पर आएं और कहें …. “शिक्षा हमारा अधिकार है, आपकी दया नहीं!”
आपके विचारों, सुझावों का स्वागत है
धन्यवाद
आपका
दीपक सिंह सरीन
( विशेष नोट – यह आर्टिकल दीपक सिंह सरीन जी के द्वारा लिखा गया मौलिक आर्टिकल है कृपया बिना नाम के प्रयोग न करें)

